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Corruption in India: सिस्टम की सबसे बड़ी बीमारी और उससे बाहर निकलने के रास्ते

Corruption in India सिस्टम की सबसे बड़ी बीमारी और उससे बाहर निकलने के रास्ते

भारत एक बड़ी अर्थव्यवस्था है, लाखों-करोड़ों लोग मेहनत करते हैं, टैक्स भरते हैं, लेकिन नतीजा क्या है? लोगों को नकली दवाइयां मिलती हैं, महंगा तेल और बिजली खरीदनी पड़ती है, अच्छी सड़कें नहीं बनतीं, सरकारी दफ्तरों में उनकी सुनी नहीं जाती और अस्पताल कभी इलाज देने से ज्यादा पैसे हजम करने का जरिया बन जाते हैं। सवाल उठता है कि जिम्मेदार कौन है? जवाब है – करप्शन (भ्रष्टाचार)

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भ्रष्टाचार अब कोई सिस्टम की कमजोरी नहीं बल्कि पूरा सिस्टम ही बन चुका है। अंग्रेजों के समय जो ब्यूरोक्रेसी हमें मिली थी, उसका मकसद जनता की सेवा नहीं बल्कि उसे कंट्रोल करना था। यही स्ट्रक्चर आज तक बिना बदलाव चल रहा है, जिसमें करप्शन हर स्तर पर मौजूद है।

आज़ाद भारत का पहला करप्शन केस – Jeep Scam

आजादी के तुरंत बाद 1947-48 के दौर में भारत-पाक युद्ध चल रहा था और भारतीय आर्मी को जीप्स की ज़रूरत थी। तत्कालीन हाई कमिश्नर वी.के. कृष्णा मेनन ने बिना टेंडर और बिना इंस्पेक्शन के यूके की कंपनी से पुरानी जीप्स खरीदीं। 80 लाख रुपये की इस डील पर आर्मी ने इन जीप्स को रिजेक्ट कर दिया। बाद में जांच भी हुई लेकिन केस बंद कर दिया गया और यही आज़ाद भारत का पहला बड़ा करप्शन केस माना गया।

यहीं से करप्शन की जड़ें जमती गईं और धीरे-धीरे यह राजनीति से लेकर आम आदमी के जीवन तक फैल गया।

License Raj और बिजनेस-Politics Nexus

1947 से लेकर 1991 तक भारत में License Raj चला। हर बिजनेस, हर काम के लिए लाइसेंस, अप्रूवल और परमिट चाहिए होता था। बिजनेस हाउसेस नहीं चाहते थे कि कोई नया कॉम्पिटिटर आए, इसलिए सरकार और पॉलिटिशियंस को फंड देकर कॉन्ट्रैक्ट्स और लाइसेंस अपने कब्जे में रखते। यहीं से कॉर्पोरेट और राजनीति का भ्रष्ट गठजोड़ शुरू हुआ।

धीरे-धीरे दलाल सिस्टम आया जहां बिचौलिये पब्लिक से पेमेंट लेकर सरकारी अफसरों तक रिश्वत पहुंचाने लगे। आज भी ड्राइविंग लाइसेंस ऑफिस के बाहर दलाल बैठे मिलते हैं। सवाल है कि नेता इसे रोकते क्यों नहीं?

चुनाव और करप्शन का गहरा रिश्ता

भारत में चुनाव कोई सामाजिक सेवा नहीं बल्कि इन्वेस्टमेंट बन गया है। टिकट पैसे देकर खरीदी जाती है, चुनाव में करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और जीतने के बाद नेता सबसे पहले चुनाव में लगा पैसा “रिकवर” करते हैं। यही वजह है कि बड़े-बड़े घोटाले होते हैं और अफसरों की मिलीभगत से यह सब चलता रहता है।

पुलिस और कानून-व्यवस्था में भ्रष्टाचार

2025 के एक सर्वे के मुताबिक 63% भारतीयों को पुलिस पर भरोसा नहीं है। चालान माफ करने से लेकर एफआईआर लिखने, जेल में सुविधाएं दिलाने, यहां तक कि केस की दिशा बदलने तक हर काम पैसों से जुड़ा होता है। अदालतों में भी यही हाल है। जमानत दरअसल एक “रेट लिस्ट” बन चुकी है। कई मामलों में जजों पर करप्शन के आरोप सामने आए हैं लेकिन अकाउंटेबिलिटी लगभग शून्य है।

पब्लिक डिपार्टमेंट्स – बिजली से लेकर नगर निगम तक

बिजली विभाग, नगरपालिका, जल बोर्ड, फूड सेफ्टी, सड़क निर्माण — हर जगह रिश्वत और मिलभगत का बोलबाला है। नकली दवाइयां अस्पतालों में पहुंचाई जाती हैं, स्कूलों में मिड डे मील का राशन खा लिया जाता है, नगर निगम फर्जी बिल पास करके टैक्स के पैसे हड़प लेता है।

शिक्षा क्षेत्र में ट्रांसफर माफिया, प्राइवेट स्कूलों की मनमानी फीस, यूनिवर्सिटीज़ में डिग्री बेचने जैसे स्कैम हैं। पेपर लीक और व्यापम घोटाला तो भ्रष्टाचार का नया चेहरा ही बन चुके हैं।

हेल्थ सेक्टर की लूट

प्राइवेट हॉस्पिटल ओवरबिलिंग और अननेसेसरी टेस्ट/सर्जरी करके मरीजों को ठगते हैं, वहीं सरकारी हॉस्पिटल में गरीबों के हिस्से की दवाएं गायब हो जाती हैं। पेशन्ट्स को लूटने पर कोई सख्त चेकिंग सिस्टम नहीं है।

मीडिया और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ

मीडिया, जिसे भ्रष्टाचार उजागर करना चाहिए, वह खुद कॉर्पोरेट और राजनीति के दबाव में है। बड़े बिजनेस हाउस मीडिया में पैसा लगाते हैं और पॉलिटिकल पार्टीज़ अपने फेवर में खबरें चलवाती हैं। इसी वजह से आम जनता का मीडिया पर भरोसा टूट चुका है।

विदेशों से सीख – Singapore और Denmark

सिंगापुर एक समय एशिया का ब्राइब कैपिटल था। लेकिन वहां सरकार ने Corrupt Practices Investigation Bureau बनाया जो सीधे प्रधानमंत्री के अंडर था। अधिकारियों की सैलरी बढ़ाई गई और करप्शन रिपोर्ट करने के लिए सुरक्षित डिजिटल सिस्टम लागू हुआ। नतीजा – आज सिंगापुर ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल रैंकिंग में दुनिया के सबसे ईमानदार देशों में से एक है।

डेनमार्क ने भी 19वीं सदी में “रॉटन स्टेट” का टैग झेला। सरकारी ठेकों में फैमिलीवाद और टैक्स में चोरी हावी थी। बाद में हर सरकारी खर्च को पब्लिक पोर्टल पर डालना अनिवार्य हुआ और व्हिसलब्लोअर्स को 100% इम्यूनिटी दी गई। आज डेनमार्क दुनिया का सबसे क्लीन देश है।

भारत में मौजूद कानून और उनकी कमजोरी

भारत में Prevention of Corruption Act, Lokpal, Whistleblower Protection Act, CVC और Right to Information जैसे कई कानून बनाए गए हैं, लेकिन इनका असर सीमित है। क्यों?

  • जांच एजेंसियां पॉलिटिकल प्रेशर में काम करती हैं

  • ट्रायल बहुत स्लो होते हैं

  • गवाह पलट जाते हैं

  • लॉ में इतने लूपहोल्स हैं कि आरोपी बच जाते हैं

  • पब्लिक का गुस्सा कम समय तक रहता है

Solution क्या है?

अगर सिस्टम को ठीक करना है तो इसे आम लोगों के प्रति जवाबदेह बनाना होगा।

  • सारे सरकारी काम डिजिटाइज और पेपरलेस हों

  • Fixed time-bound complaint redressal system लागू हो

  • Online rating system से हर विभाग को जनता से स्कोर मिलना चाहिए

  • Judiciary में AI-driven case system और fast-track anti-corruption courts हों

  • Private schools की फीस पैरेंट बोर्ड तय करे

  • Healthcare billing पर government notified rates हों

  • Political funding पूरी तरह ट्रांसपेरेंट हो और Independently audited हो

  • एक परिवार से एक व्यक्ति ही राजनीति कर सके

  • हर MP/MLA की approval rating पब्लिक पोर्टल पर हो

नागरिकों की भूमिका

सिस्टम बदले यह जरूरी है, लेकिन समाज की सोच बदलना और भी जरूरी है। “सब चलता है” वाला एटीट्यूड छोड़कर हमें ईमानदारी की आदत बच्चों से ही डालनी होगी। स्कूल स्तर पर लीगल अवेयरनेस और सिविक एजुकेशन लाना जरूरी है।

निष्कर्ष

भारत में करप्शन कोई नई समस्या नहीं है, यह दशकों से सिस्टम में गहराई तक बैठा है। लेकिन यह भी सच है कि अगर सही नीयत और मजबूत इच्छाशक्ति हो तो इसे खत्म किया जा सकता है। Singapore और Denmark इसका उदाहरण हैं। भारत के पास भी कानून और टेक्नोलॉजी दोनों हैं, जरूरत है सिर्फ सख्त और निष्पक्ष अमल की।

अगर जनता अपनी आवाज उठाए, सिस्टम को जवाबदेह बनाया जाए और राजनीतिक फंडिंग में ट्रांसपेरेन्सी लायी जाए, तो भ्रष्टाचार की यह जड़ कमजोर हो सकती है। अब वक्त आ गया है कि हर नागरिक यह पूछे – “देश मेरा है, तो जिम्मेदारी भी मेरी है। भ्रष्टाचार को खत्म करने की शुरुआत मुझसे ही होनी चाहिए।”

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